अध्यापक उस दीपक के समान है जो खुद जलकर दूसरों को प्रकाश देता है |

अध्यापक उस दीपक के समान है जो खुद जलकर दूसरों को प्रकाश देता है |

काव्य सरिता


  उसको ढूंढ रहा हूं    .......... अजमल सल्तानपुरी ,
मुसलमां और हिंदू की जान

कहां है मेरा हिंदुस्तान

मैं उसको ढूंढ रहा हूं
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

मेरे बचपन का हिंदुस्तान

न बंग्लादेश न पाकिस्तान

मेरी आशा मेरा अरमान
वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

वो मेरा बचपन, वो स्कूल

वो कच्ची सड़कें, उड़ती धूल

लहकते बाग, महकते फूल
वो मेरा खेत, मेरा खलिहान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

मुसलमां और हिंदू की जान

कहां है मेरा हिंदुस्तान

मैं उसको ढूंढ रहा हूं
वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत

कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत

पहाड़ी गीतों के संगीत
दिहाती लहरा, पुरबी तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत

कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत

पहाड़ी गीतों के संगीत
दिहाती लहरा, पुरबी तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं
मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं

जहां के कृष्ण, जहां के राम

जहां की श्याम सलोनी शाम

जहां की सुबह बनारस धाम
जहां भगवान करैं स्नान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं
मुसलमां और हिंदू की जान
कहां है मेरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

जहां थे तुलसी और कबीर

जायसी जैसे पीर फकीर

जहां थे मोमिन, गालिब, मीर
जहां थे रहमत और रसखान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान
वो मेरे पुरखों की जागीर

कराची, लाहौर और कश्मीर

वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर
वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

जहां की पाक-पवित्र जमीन

जहां की मिट्टी खुल्दनशीन

जहां महाराज मोईनुउद्दीन
गरीब नवाज हिंदुस्तान
मुसलमां और हिंदू की जान
कहां है मेरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं

ये भूखा शायर, प्यासा कवि

सिसकता चांद, सुलगता रवि

ये भूखा शायर, प्यासा कवि

सिसकता चांद, सुलगता रवि

वो जिस मुद्रा में ऐसी छवि
करा दे अजमल को जलपान
मैं उसको ढूंढ रहा हूं





दुआ

लब[1] पे आती है दुआ[2] बनके तमन्ना मेरी

ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाये

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत[3] 

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब

इल्म[4] की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत[5] करना

दर्द-मंदों से ज़इफ़ों[6] से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको





ये ज़िन्दगी
कभी हँसते हुए छोड़ देती
है "ये ज़िन्दगी!!
कभी रोते हुए छोड़ देती है "
ये ज़िन्दगी!!   
  "न पूर्ण विराम सुख में....   
     "न पूर्ण विराम दु:ख में...
    बस जहाँ देखो वहाँ "अल्पविराम छोड़ देती है ये जिंदगी!!
"प्यार की डोर सजाये रखो !!
"दिल को दिल से मिलाये रखो!!
"क्या लेकर जाना है साथ में इस दुनिया से!!!
"मीठे बोल और अच्छे व्यवहार से  " रिश्तों को बनाए रखो!!     


फिर मनाएगा कौन ?

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए
फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है, कल खाई होगी
फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप, तुम भी चुप
इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन ?
बात छोटी को लगा लोगे दिल से,
तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और  तुम भी बिछड़कर,
सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
न मैं राजी, न तुम राजी,
फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी,
तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,
इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से अगर  किसी दिन एक ने आँखें....
तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन ?


जीवन नहीं मरा करता है।
छिप-छिप अश्रु बहाने वालो, मोती व्यर्थ बहाने वालो
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गई तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालो, फटी कमीज़ सिलाने वालो
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालो
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।



आते हैं याद अक्सर
न जाने क्यों महसूस नहीं होती वो गरमाहट,
इन ब्राँडेड वूलन गारमेंट्स में ,
जो होती थी
दिन- रात, उलटे -सीधे फन्दों से बुने हुए स्वेटर और शाल में.
आते हैं याद अक्सर
वो जाड़े की छुट्टियों में दोपहर के आँगन के सीन,
पिघलने को रखा नारियल का तेल,
पकने को रखा लाल मिर्ची का अचार.
कुछ मटर छीलती,
कुछ स्वेटर बुनती,
कुछ धूप खाती
और कुछ को कुछ भी काम नहीं,
भाभियाँ, दादियाँ, बुआ, चाचियाँ.
अब आता है समझ,
क्यों हँसा करती थी कुछ भाभियाँ ,
चुभा-चुभा कर सलाइयों की नोक इधर -उधर,
स्वेटर का नाप लेने के बहाने,
याद है धूप के साथ-साथ खटिया
और
भाभियों और चाचियों की अठखेलियाँ.
अब कहाँ हाथ तापने की गर्माहट,
वार्मर जो है.
अब कहाँ एक-एक गरम पानी की बाल्टी का इन्तज़ार,
इन्स्टेंट गीजर जो है.
अब कहाँ खजूर-मूंगफली-गजक का कॉम्बिनेशन,
रम विथ हॉट वॅाटर जो है.
सर्दियाँ तब भी थी
जो बेहद कठिनाइयों से कटती थीं,
सर्दियाँ आज भी हैं,
जो आसानी से गुजर जाती हैं.
फिर भी
वो ही जाड़े बहुत मिस करते हैं,
बहुत याद आते हैं.
                               -गुलज़ार





बेबसी
हर खुशी है फिर भी
मन हो जाता है बेचैन उदास
पढ़ती हूँ जब नित खबरों में
कन्या भ्रूण ह्त्या व मासूम संग ,बलात्कार
ईश्वर की महान कृति इनसान
क्यों बनता जा रहा हैवान
देख् समाज की ये दुर्दशा
हो जाती हूँ विचलित, परेशान
हर नर -नारी की ,जननी नारी
फिर भी क्यों अबला ,बेचारी
झूठी पड़ती सभी धारणा
नारी है लक्षमी ,देवी-अवतारी
कुत्सित-मनोवृत्ति ,का शिकार
भावना-शून्य होता इनसान
क्यों करता शर्मिंदा ,हमको
कहाँ खो गया ,मेरा भारत महान
अहिंसक मन हो उठता है हिंसक
देख् दरिन्दों का व्यवहार
होता यदि कुछ,मेरे वश में
करवा देती मैं संहार
या फिर देती ऐसी यातना
सात पीढ़ियाँ दुष्टों की घबराती
करते ऐसा जघन्य अपराध
हैवानो की भी आत्मा घबराती
पर नहीं है मेरे वश में कुछ भी
मै भी तो बेबस लाचार
आँसू बन गए हैं लाचारी
बस,है किसी चमत्कार का इंतज़ार
कभी तो प्रकट होंगी दुर्गा माँ
या लेंगे लक्ष्मण अवतार
या पटेल सा कोई नेता होगा
तो होगा लज्जित भारत माँ का उद्धार
अरे!समाज के ठेकेदारों
जागो ,कुंभकर्णी नींद सोने वालों
या डूब मरो चुल्लू भार पानी में
ओ देश के सुप्त पहरेदारों ।



संविधान
मैं बोलता हूँ........
मैं बोलता हूँ
मैं लिखता हूँ
मुझे लगता है
मुझे बोलना चाहिए
मुझे लिखना चाहिए
फ़ंजाओं में घुले
अनजाने डर को
क्या तुम नहीं भांप पाते हो
यदि तुम्हारे मन में
है सवाल
तो फिर क्यों नहीं बोलते
क्यों नहीं लिखते
तुम्हारा दायित्व है
अधिकार भी है
कि तुम बोलो
तुम लिखो
साहस के साथ
अदम्य उत्साह के साथ
हर उस बात के खिलाफ
जो गलत है
अनुचित है
अनुचित के खिलाफ
बोलना
लिखना
जरूरी बेहद जरूरी है
खामोशी आखिर तुम को
जमीन में
गहरे अंतहीन अंधकार को
सुपुर्द कर देगी
खामोशी कई बार
खुद के लिए
कब्र बन जाती है
बोलो
दिल खोल कर के
कौन रोकता है
कौन क्या कहता है
फर्क नहीं पड़ता
पड़ता है मगर फर्क
तो अब ना बोलने से
ना लिखने से
लिखो
बोलो
बदलो
जरूरत है जमाने को
बदलने की
समझने की
सुनने की
तुम्हारा बोलना
तुम्हारा लिखना
शायद अब
तुम्हारी खामोशी से
ज्यादा जरूरी है
तुम बोलो
या लिखो या
अब भी खामोश रहो
अब मर्जी तुम्हारी......



कतारें
कतारें थककर भी खामोश हैं,नजारे बोल रहे हैं,
नदी बहकर भी चुप है मगर किनारे बोल रहे हैं।।
ये कैसा जलजला आया मुल्क में इन दिनों,
झोंपडी सारी खडी है और महल डोल रहे हैं।।
परिंदों को तो रोज कहीं से गिरे हुए दाने जुटाने हैं....
परेशान वो हैं जिनके घरों में भरे हुए तहखाने है🙏🙏





मै
सर्द पहलू में पिघलते हुए ज़ज़्बात सी हुं मै, हैं बनते और बिगड़ते जो,उन हालात सी हूॅं मैं ।।
हो रंग केसरिया या अबीर तेरे ख्यालों में, कर दे बेरंग सभी रंग, उस बरसात सी हूॅं मैं ।।
दर्द कितना भी हो गहरा तेरे दिल का मगर, करूं नजर से बेअसर, उस करामात सी हूॅं मैं ।।
गमों की रात होती होगी ,बेशक बहुत ही लम्बी, मिले सुकूं सुबहा जहां तुझे ,उस हयात सी हूॅं मैं ।।
राहों में मिले होंगे ,तुझे मुसाफिर कितने, ज़िदंगी भर ना भूल सके ,उस मुलाकात सी हूॅं मैं ।।
खत्म हो जाते है, रोज़ किस्से कितने हि, शुरू होती है कहानी जैसे,उस शुरूआत सी हूं मै ।।
जीते होंगे तुम ने खेल बहुत से, पर दे तुझे जो हरा, उस शह और मात सी हूं मै ।।





जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,

लहरालहरा यह शाखा‌एँ कुछ शोक भुला देती मन का,

कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,

जीवन की झिलमिलसी झाँकी नयनों के आगे आती है,

स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है!
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जा‌एँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पा‌एँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,

इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको,

कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,

वे भार दि‌ए धर कंधों पर, जो रोरोकर हमने ढो‌ए,

महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा!
उर में एसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सो‌ए!
अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूरकठिन को कोस चुके,
उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे! ऐसी भी घड़ियाँ आ‌ऐंगी,

जब दिनकर की तमहर किरणे तम के अन्दर छिप जा‌एँगी,

जब निज प्रियतम का शव रजनी तम की चादर से ढक देगी,
तब रविशशिपोषित यह पृथिवी कितने दिन खैर मना‌एगी!
जब इस लंबेचौड़े जग का अस्तित्व न रहने पा‌एगा,
तब तेरा मेरा नन्हासा संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आ‌एगा, कोयल न कुहुक फिर पा‌एगी,

बुलबुल न अंधेरे में गागा जीवन की ज्योति जगा‌एगी,

अगणित मृदुनव पल्लव के स्वर 'भरभर' न सुने जा‌एँगे,
अलि‌अवली कलिदल पर गुंजन करने के हेतु न आ‌एगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का अवसान, प्रिय हो जा‌एगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु गर्जन निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,

निर्झर भूलेगा निज 'टलमल', सरिता अपना 'कलकल' गायन,

वह गायकनायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा!
मुँह खोल खड़े रह जा‌एँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण!
संगीत सजीव हु‌आ जिनमें, जब मौन वही हो जा‌एँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का, जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे जो हार चमेली ने पहने,

वह छीन रहा देखो माली, सुकुमार लता‌ओं के गहने,

दो दिन में खींची जा‌एगी ऊषा की साड़ी सिन्दूरी
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा पा‌एगा कितने दिन रहने!
जब मूर्तिमती सत्ता‌ओं की शोभाशुषमा लुट जा‌एगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,

फिर भी उस पार खड़ा को‌ई हम सब को खींच बुलाता है!

मैं आज चला तुम आ‌ओगी, कल, परसों, सब संगीसाथी,
दुनिया रोतीधोती रहती, जिसको जाना है, जाता है।
मेरा तो होता मन डगडग मग, तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!






नर हो, न निराश करो मन को -मैथिलीशरण गुप्त


नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

जग में रह कर कुछ नाम करो

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलों कि सुयोग न जाय चला

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला

समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ

फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ

तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे

मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए

सब वांछित वस्तु विधान किए

तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं

कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं

जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो

निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो

बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो



इतनी तवील [1]उम्र को जल्दी से काटना


इतनी तवील [1]उम्र को जल्दी से काटना

जैसे दवा की पन्नी को कैंची से काटना
छत्ते से छेड़छाड़ की आदत मुझे भी है

सीखा है मैंने शहद की मक्खी से काटना

इन्सान क़त्ल करने के जैसा तो ये भी है

अच्छे-भले शजर[2]को कुल्हाड़ी से काटना

पानी का जाल बुनता है दरिया तो फिर बुने

तैराक जानता है हथेली से काटना

रहता है दिन में रात के होने का इंतज़ार

फिर रात को दवाओं की गोली से काटना

ये फ़न[3] कोई फ़क़ीर सिखाएगा आपको

हीरे को एक फूल की पत्ती से काटना

मुमकिन[4]है मैं दिखाई पड़ूँ एक दिन तुम्हें

यादों का जाल ऊन की तीली से काटना

इक उम्र तक बज़ुर्गों के पैरों मे बैठकर

पत्थर को मैंने सीखा है पानी से काटना








सिर्फ ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है - श्री हरिवंशराय बच्चन
जीवन पथ जटिल है ये , कालचक्र कठिन है ये ,

पग पग में भेद- भाव है, रक्त-रंजित पांव है,

जन्म से किसी के सर वंश की छाँव है,
झूठ के रथ पे सवार डाकुओं का गाँव है,
किसी के पास है छल-कपट, किसी को रूप का वरदान है,
ये सोच के मत बैठ जा की ये विधि का विधान है,
बज रहा मृदंग है, ये कहता अंग अंग है,
की प्राणी अभी शेष है, मान अभी शेष है,
उठा ले ज्ञान का धनुष,
एक कण भी और कुछ मांग मत भगवन से,
ज्ञान की कमान पे लगा दे तू विजय तिलक,
काल के कपाल पे लिख दे तू ये गुलाल से,
"की शेक सकता है कोई तोह शेक के दिखा मुझे,
हक छीनता आया है जो अब छीन के दिखा मुझे |"
ज्ञान के मंच पर सब एक समान हैं,
विधि का विधान पलट दे, वो ब्रह्मास्त्र ज्ञान है,
तोह आज से ये ठान ले, ये बात गाँठ बाँध ले,
की कर्म के कुरुक्षेत्र में 
न रूप काम अत है, न झूठ काम आता है,
न जाति काम आती है, न बाप काम आता है,
सिर्फ ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है |
श्री हरिवंशराय बच्चन







प्राणप्रिये
घर में रहीं तो," ये करो और वो करो "

पेपर भी नीचे गिरा तो," कितना घर फैलाते हो "

इसीलिए सोचा चार दिन को,जाती हो तुम मायके

आराम और सुख से,अकेला रहूँगा चैन से।।

ख़ुशी ख़ुशी छोड़ा उसे,ट्रेन में दिया बिठाल।

क्या सुनाऊँ मित्रों,तुमको अपना हाल।।

सुबह जागने पर सोचा,सारा कचरा निकालूँ।कोना कोना ढूँढ लिया पर मिला ना मुझको झाडू।।
सोचा कचरा पड़ा रहन दो,दाँत घिसता हूँ बेस्ट।

ब्रश तुरंत मिल गया, पता नहीं,कहाँ रख गई पेस्ट।।

नहाने को गरम पानी,बढ़िया किया तैयार।

टॉवल बाहर रह गया,किसे पुकारूँ यार।।

मिलता नहीं पतीला,दूधवाला आया।

यहाँ वहाँ सब ढूँढ लिया,ढक्कन ना मिल पाया।।

गया बनाने चाय तो,नहीं मिल रही शक्कर।

गैस जलाऊँ कैसे,बिगड़ गया है, लाइटर।।

दोपहर के भोजन में,तेज हो गई भाजी।

कड़क कड़क रोटी बनी,मन कैसे हो राजी।।

चावल गीला हो गया,दाल बन गई पतली।

हर कौर के साथ आँख से,आँसू की धारा निकली।।

किटकिट किटकिट करती रानी,जब तुम घर में होतीं।

लेकिन जीवन सूना लगता,पास नहीं जब तुम होतीं।।

मैं अगर शिव हूँ, तो,तुम हो मेरी शक्ति।

पूजा मेरी संग तुम्हारे,साथ साथ है भक्ति।।

सहचारिणी हे प्राणसखी,विनती है ये मेरा गाना।

जब भी तुम जाओ कहीं,संग मुझे भी ले जाना।।






औरत सब संभाल लेती है.

    *सिर्फ महसूस किया जा सकता है...*
● वो "औरत" दौड़ कर रसोई तक , 

दूध बिखरने से पहले बचा लेती है ।

● समेटने के कामयाब मामूली लम्हों में , 

बिखरे "ख्वाबों" का गम भुला देती है ।

● वक्त रहते रोटी जलने से बचा लेती है ,
 कितनी "हसरतों" की राख उडा देती है ।
● एक कप टूटने से पहले सम्हालती है , 

टूटे "हौसलों" को मर्जी से गिरा देती है ।

● कपडों के दाग छुडा लेती सलीके से , 

ताजा "जख्मों" के हरे दाग भुला देती है ।

● कैद करती "अरमान" भूलने की खातिर", 

रसोई के बंद डिब्बों में सजा लेती है ।

● नाजुक लम्हों के "अफसोस" की स्याही, 

दिल की दीवार से बेबस मिटा लेती है ।

● मेज कुर्सियों से "गर्द" साफ करती , 

चंद ख्वाबों पर "धूल" चढा लेती है ।

● सबके सांचे में ढालते अपनी जिंदगी, "हुनर"
 बर्तन धोते सिंक में बहा देती है ,

कपडों की तह में लपेट कुछ "शौक",

अलमारी में खामोशी से दबा देती है ।
● अजीज चेहरों की आसानी की खातिर , 

अपने "मकसद" आले में रख भुला देती है ।

● घर भर को उन्मुक्त गगन में उडता देखने ,

अपने सपनों के पंख काट लेती है ।

     *हां... हर घर में एक  "औरत"  है ,*
*जो  बिखरने  से  पहले  ही  सब  सम्हाल  लेती  है..!!*




कोमल है कमजोर नहीं तू 
कोमल है कमजोर नहीं तू , 

शक्ति का नाम ही नारी है ! 

जग को जीवन देने बाली , 
मौत भी तुझसे हारी है ! 
सतियों के नाम पे तुझे जलाया , 
मीरा के नाम पे जहर पिलाया 
सीता जैसी अग्नि परीक्षा , 
आज भी जग में जारी है !
कोमल है कमजोर नहीं तू , शक्ति का नाम ही नारी है
इल्म , हुनर में, दिल दिमाग में , 
किसी बात में कम तो नहीं 
पुरुषों बाले सारे ही, 
अधिकारों की अधिकारी है ! 
बहुत हो चुका अब मत सहना , 
तुझे इतिहास बदलना है !
नारी को कोई कह ना पाए , 
अबला है बेचारी है !
कोमल है कमजोर नहीं तू , शक्ति का नाम ही नारी है





चेतक
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर

चेतक बन गया निराला था

राणाप्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था

जो तनिक हवा से बाग हिली

लेकर सवार उड़ जाता था

राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था

गिरता न कभी चेतक तन पर

राणाप्रताप का कोड़ा था

वह दौड़ रहा अरिमस्तकदुश्मन का माथा पर
वह आसमान का घोड़ा था

था यहीं रहा अब यहाँ नहीं

वह वहीं रहा था यहाँ नहीं

थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं

निर्भीक गया वह ढालों में

सरपट दौडा करबालों में

फँस गया शत्रु की चालों में
बढ़ते नद-सा वह लहर गया

फिर गया गया फिर ठहर गया

विकराल वज्रमय बादल-सा
अरिदुश्मन की सेना पर घहर गया

भाला गिर गया गिरा निसंग

हयघोड़ा टापों से खन गया अंग

बैरी समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग

हैं जन्म लेते जगह में एक ही, 

एक ही पौधा उन्हें है पालता 

रात में उन पर चमकता चाँद भी, 
एक ही सी चाँदनी है डालता।

मेह उन पर है बरसता एक सा, 

एक सी उन पर हवाएँ हैं बही 

पर सदा ही यह दिखाता है हमें, 
ढंग उनके एक से होते नहीं।

छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ, 

फाड़ देता है किसी का वर वसन 

प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर, 
भँवर का है भेद देता श्याम तन।

फूल लेकर तितलियों को गोद में 

भँवर को अपना अनूठा रस पिला, 

निज सुगन्धों और निराले ढंग से 
है सदा देता कली का जी खिला।

है खटकता एक सबकी आँख में 

दूसरा है सोहता सुर शीश पर, 

किस तरह कुल की बड़ाई काम दे 
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।



मानवता के मन मन्दिर में
मानवता के मन मन्दिर में

ज्ञान का दीप जला दो

करुना निधान भगवान् मेरे
भारत को स्वर्ग बना दो
करुना निधान भगवान् मेरे
भारत को स्वर्ग बना दो

दुःख दरिद्द्रता का नाश करो

मानव के कष्ट मिटा दो

अमृत की वर्षा बरसाकर
भूख की आग मिटा दो
खेतों में हरियाली भर दो
धान के ढेर लगा दो

करुना निधान भगवान् मेरे

भारत को स्वर्ग बना दो

मानवता के मन मन्दिर में

ज्ञान का दीप जला दो

करुना निधान भगवान् मेरे
भारत को स्वर्ग बना दो

नव प्रभात फिर महक उठे

मेरे भारत की फुलवारी

सब हो एक समान जगत में
कोई न रहे भिखारी
एक बार माँ वसुंधरा को
नव श्रृंगार करा दो

करुना निधान भगवान् मेरे

भारत को स्वर्ग बना दो

मानवता के मन मन्दिर में

ज्ञान का दीप जला दो

करुना निधान भगवान् मेरे
भारत को स्वर्ग बना दो
करुना निधान भगवान् मेरे
भारत को स्वर्ग बना दो




फेंक दो तुम भी
पुराने पड़ गये डर, फेंक दो तुम भी
ये कचरा आज बाहर फेंक दो तुम भी
लपट आने लगी है अब हवाओं में
ओसारे और छप्पर फेंक दो तुम भी
यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते
इन्हें कुंकुम लगा कर फेंक दो तुम भी
तुम्हें भी इस बहाने याद कर लेंगे
इधर दो—चार पत्थर फेंक दो तुम भी
ये मूरत बोल सकती है अगर चाहो
अगर कुछ बोल कुछ स्वर फेंक दो तुम भी
किसी संवेदना के काम आएँगे
यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी.




    साये में धूप~दुष्यंत कुमार
भाग इंसान भाग

तेरा भाग्य तभी उठेगा जाग,

सुस्त पड़ा सोता रहेगा
यह जग तेरे आगे निकल जायगा |
यह शरीर मिला है तुझे
इसका कुछ कर्म है
हर अंग का कुछ धर्म है
उसका तू पालन कर |

श्रीकृष्ण ने कहा,

“बिना फल की इच्छा

तू कर्म कर …….”
किन्तु बिना फल की इच्छा,
तेरी कर्म करने की इच्छा जायगी मर |
इसीलिए तू फल की इच्छा कर
और कुछ तो कर्म कर !

जगत में …..

तू है एक विद्यार्थी

सदा एक शिक्षार्थी,
पढ़ना, लिखना, सीखना
फिर हर परीक्षा में पास होना
लेकर प्रभु का नाम
है यही तेरी नियति, तेरा काम |

परीक्षा कक्ष में …

जब तक कापी कलम

तेरे हाथ में हैं,
सब कुछ तेरे वश में हैं |
जो मन करे, तू लिख
न मन करे, न लिख
पर ध्यान रख
जैसा लिखेगा
वैसा फल मिलेगा…
कापी तूने निरीक्षक को दिया,
तेरे हाथ से सब कुछ निकल गया |

अब सब कुछ परीक्षक के हाथ में है |

जितना अंक देता है,

परीक्षा कक्ष में किये
वही तेरा कर्मफल है |
गलत मत समझ तू
श्रीकृष्ण ने सही कहा है,
तेरा काम परीक्षा देना है
परीक्षक का काम फल देना है;
परीक्षा देने(कर्म) का अधिकार
तेरे पास है,
फल देने का अधिकार
परीक्षक के पास है |
सबको अपने कर्मों का
सही फल मिलता है
“जैसा कर्म करता इंसान
वैसा फल देता भगवान् ” |

जो कुछ भी लागु होता है ,

वो आम के लिए होता है 

खास के लिए कुछ खास नहीं ।
और आम को इससें आस नहीं।
अब आम एक आम 
खास एक खास नहीं ।
पर इस बार का जो लागु है
वो वाकई में लगता लागु है 
अमीर भी भाग रहा है और गरीब भी 
खुशनसीब भी भाग रहा,बदनसीब भी
गरीब को गरीबी पर 
अमीर को अमीरी पर 
हो रहा है विश्वास नहीं 
अब आम एक आम
और
खास एक खास नहीं । 
कहने को तो मचा हुआ कोहराम है
पर अन्दर ही अन्दर सबको आराम है 
आम को पूरे हैं आम मिल  रहे 
ऊपर सें गुठलियों के दाम मिल रहे 
हकीकत है यह झूठी बकवास नहीं 
अब आम एक आम 
और 
खास एक खास नहीं ।
उनके भी दिन आये हैं जिनको हमने भूला दिया 
जब चाहा हंसा दिया जब चाहा उनको
रूला दिया 
इस खुशहाली की लहर मे 
एक भी चेहरा उदास नहीं 
अब आम एक आम 
और 
खास एक खास नहीं ।






पिता 
चले गए वे अपने घर से 

पर वे मन से दूर नहीं हैं !

चले गए वे इस जीवन से  
लेकिन लगते दूर नहीं हैं !
उन्हें  याद करने पर अपने, 
कंधे  हाथ रखे पाएंगे !
अपने आसपास रहने का,वे आभास दिए जायेंगे !

अब न मिलेगी पप्पी उनकी  

पर स्पर्श , तो बाकी होगा ! 

अब न मिलेगी आहट उनकी 
पर अहसास तो बाकी होगा !
कितने ताकतवर लगते थे,
वे कठिनाई के मौकों पर !
जब जब याद करेंगे उनको , हँसते हुए खड़े पाएंगे !

अपने कष्ट नही कह पाये

जब जब वे बीमार पड़े थे 

हाथ नहीं फैलाया आगे 
स्वाभिमान के धनी बड़े थे
पाई पाई बचा के कैसे, 
घर  की दीवारें  बनवाई !
जब देखेंगे खाली कुर्सी, पापा  याद बड़े आयेंगे !

तिनका तिनका जोड़ उन्होंने 

अपना घर निर्माण किया था !  

कैसे कैसे हम बच्चों को 
अपने पैरों खड़ा किया था 
हमें पता है वे सुख दुःख 
के सपनों में, जरूर आयेंगे !
हमें रास्ते प्यास लगी तो , जल से भरे घड़े पाएंगे !

उनके बचे काम को हमने 

तन मन से पूरा करना है,

उनके दायित्यों को सबने  
हंस हंसकर पूरा करना है ! 
चले गए वे बिना बताये 
पर ऐसा आभास रहेगा ! 
दुःख में हमें सहारा देने, पापा पास खड़े पाएंगे !





"दोस्त  
✳कदम  रुक  गए  जब  पहुंचे

      हम  "रिश्तो" के  बाज़ार में..

✳बिक  रहे  थे  रिश्ते,

       खुले  आम  व्यापार  में..

✳कांपते  होठों  से  मैंने  पूँछा, 

      "क्या  "भाव'  है  भाई

       इन  रिश्तों  का..?"
✳ दुकानदार  बोला:-
✳ "कौन  सा  लोगे..?
✳ बेटे  का  ..या  बाप  का..?
✳ बहिन  का..या  भाई  का..?
✳ बोलो  कौन  सा  चाहिए..?
✳ इंसानियत  का..या  प्रे का..?
✳ माँ   का..या   विश्वास का..?
✳बाबूजी   कुछ  तो   बोलो

      कौन.  सा   चाहिए??

✳चुपचाप   खड़े   हो

       कुछ  बोलो  तो  सही...

✳मैंने  डर  कर  पूँछ  लिया

      "दोस्त  का.."

✳दुकानदार  नम  आँखों  से बोला:-
✳"संसार  इसी  रिश्ते

      पर  ही  तो  टिका  है..."

✳माफ़  करना  बाबूजी

      ये  'रिश्ता बिकाऊ नहीं है..

✳इसका  कोई   मोल

       नहीं   लगा   पाओगे,

✳और.  जिस   दिन

       ये   बिक   जायेगा...

✳उस  दिन  ये  संसार   उजड़ जायेगा.....





जलम भोम / कन्हैया लाल सेठिया

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::::::::::::

आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री

ईं धरती रो रूतबो ऊंचो, आ बात कवै कूंचो कूंचो,

आं फोगां में निपज्या हीरा, आं बांठां में नाची मीरा,

पन्ना री जामण आ सागण, आ ही प्रताप री मा भागण,

दादू रैदास कथी वाणी, पीथळ रै पाण रयो पाणी,

जौहर री जागी आग अठै, रळ मिलग्या राग विराग अठै,

तलवार उगी रण खेतां में, इतिहास मंड़योड़ा रेतां में,

बो सत रो सीरी आडावळ, बा पत री साख भरै चंबळ,

चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दिया क्षत्राणी,

ईं कूख जलमियो भामासा, राणा री पूरी मन आसा,

बो जोधो दुरगादास जबर, भिड़ लीन्ही दिल्ली स्यूं टक्कर,

जुग जुग में आगीवाण हुया, घर गळी गांव घमसान हुया,

पग पग पर जागी जोत अठै, मरणै स्यूं मधरी मौत अठै,

रूं रूं में छतरयां देवळ है, आ अमर जुझारां री थळ है,

हर एक खेजड़ै खेड़ा में, रोहीड़ा खींप कंकेड़ा में

मारू री गूंजी राग अठै, बलिदान हुया बेथाग अठै,

आ मायड़ संतां शूरां री, आ भोम बांकुरा वीरां री,

आ माटी मोठ मतीरां री, आ धूणी ध्यानी धीरां री,

आ साथण काचर बोरां री, आ मरवण लूआं लोरां री

आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठै मोरां री।





सबके जीवन के अंधेरों में उजाला भर दे !
कभी कभी यूँ भी होता है ...

निष्ठां, प्रेम, विश्वास

से बने आशियाने
झूलने लगते हैं
अविश्वास , शक
अपमान ,तिरस्कार के भूचालों से ...
चूलें चरमराने लगती हैं
जैसे बने हो ताश के पत्ते के घर
एक पत्ता हिला और सब बिखर गया..
आंसू भरी आँखों से
कितनी शिकायतें बह जाती है
काली अँधेरी- सी रात गले लग कर सिसकती है ...
उस अँधेरे में ही एक लकीर रौशनी की
जैसे कह उठती है ...
बस यह एक रात है अंधरे की ...
इसे गुजर जाने दो ...
सुबह सब कुछ वही धुला- धुला सा!
यही विश्वास बनाये रखता है
उस एक पत्ते को स्थिर ...
और फिर से वही मजबूत बुनियादें
हंसी - मुस्कुराहटों का साम्राज्य !
अँधेरी रातें उजली सुबह में बदल जाती हैं...
विश्वास हो बस कि ये भी गुजर जाएगा !
और वह हथेलियों को जोड़कर
उस अदृश्य से
प्रार्थना करती है ...
हर घर में उस एक पत्ते को स्थिर कर दे...
सबके जीवन के अंधेरों में उजाला भर दे !




तन बचाने चले थे कि मन खो गया
तन बचाने चले थे कि मन खो गया

एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही

और सब कुछ है वातावरण खो गया

दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके

तब पता यह चला, मूलधन ही खो गया

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी

यह हमारा तुम्हारा गगन भी अब खो गया

हमने पढ़कर जिसे प्यार से सीखा था कभी

एक गलती से वह व्याकरण भी खो गया




.नारी हूँ मै 
ईश्वर की अनूठी रचना हूँ मै...

हाँ ! नारी हूँ मैं ..

.कभी जन्मी कभी अजन्मी हूँ मैं ..
कभी ख़ुशी कभी मातम हूँ मैं..
.कभी छाँव कभी धूप हूँ मैं..
कभी एक में अनेक रूप हूँ मैं..
कभी बेटी बन महकती हूँ मैं..
कभी बहन बन चहकती हूँ मैं..
कभी साजन की मीत हूँ मैं...
कभी मितवा की प्रीत हूँ मैं...
कभी ममता की मूरत हूँ मैं ..
कभी अहिल्या,सीता की सूरत हूँ मैं...
कभी मोम सी कोमल पिंघलती हूँ मैं..
कभी चट्टान सी अडिग रहती हूँ मैं..
कभी अपने ही अश्रु पीती हूँ मैं...
कभी स्वरचित दुनिया में जीती हूँ मैं....
ईश्वर की अनूठी रचना हूँ मै,हाँ...
...नारी हूँ मै .....




हाथ आ कर गया, गया कोई ।
हाथ आ कर गया, गया कोई ।

मेरा छप्पर उठा गया कोई ।

लग गया इक मशीन में मैं भी

शहर में ले के आ गया कोई ।

मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी

इश्तिहार इक लगा गया कोई ।

ऐसी मंहगाई है कि चेहरा भी

बेच के अपना खा गया कोई ।

अब कुछ अरमाँ हैं न कुछ सपने

सब कबूतर उड़ा गया कोई ।

यह सदी धूप को तरसती है

जैसे सूरज को खा गया कोई ।

वो गए जब से ऐसा लगता है

छोटा-मोटा ख़ुदा गया कोई ।

मेरा बचपन भी साथ ले आया

गाँव से जब भी आ गया कोई ।







Khumar Barabankwi..वो सवा याद आये भुलाने के बाद

जिंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद
दिल सुलगता रहा आशियाने के बाद

आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद

रौशनी के लिए घर जलाना पडा

कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बाद

जब न कुछ बन पड़ा अर्जे-ग़म का जबाब

वो खफ़ा हो गए मुस्कुराने के बाद

दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा है

दोस्तों का खुलूस आज़माने के बाद

बख़्श दे या रब अहले-हवस को बहिश्त

मुझ को क्या चाहिए तुम को पाने के बाद

कैसे-कैसे गिले याद आए "खुमार"

उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बाद




॥दुआ॥

एक पेट भर हरी जमीं होगी, एक साँस भर खुला आसमाँ होगा।

मेरे लिए भी खुदा ने आखिर, बनाया कोई तो आशियाँ होगा॥

एक मुट्ठीभर थमा वक्त होगा, एक लौ भर फिक्र का धुआँ होगा।

सुकून भरे पल होंगे, कुछ यादें होंगी, मन दुबारा फिर जवाँ होगा ॥

एक गोद भर बिस्तर हो माँ जैसा और एक थपकी भर नींद

मेरे उड़ते-तैरते ख्वाबों के लिए, कोई तो दोरंगा नीला मकाँ होगा॥

जहाँ आदमी आदमी को समझें, जहाँ हकीकत सुनने में अच्छी लगे

जहाँ मुखोटे नहीं चेहरे दिखें, जहाँ सियासत का ना कोई निशाँ होगा ॥

खुदा ने अस्सी बरस देके भेजा, यहाँ लम्हों तक की फुर्सत नहीं है।

मेहनत वहाँ भी होगी सही है मगर काम सिर्फ एक मेहमाँ होगा ॥

कुछ गहरी लंबी साँसें होगी, कुछ वक्त होगा कुछ जिंदगी भी

कुछ हिम्मत होगी कुछ सोच होगी कुछ हौसलों का तूफाँ होगा ॥

ना दौलत होगी, ना लालच, ना वासना, ना डर, ना फिक्र होगी

मेरा श्याम होगा एक बंसी होगी और सुरों का हँसी कारवाँ होगा ॥

जिसे कहते हैं सब खुदा अब खुदा ही जाने वो कहाँ होगा।

एक पाक दिल होगा, एक पीर होगी, मेरा राम बस वहाँ होगा।

एक पेट भर हरी जमीं होगी, एक साँस भर खुला आसमाँ होगा।

मेरे लिए भी खुदा ने आखिर, बनाया कोई तो आशियाँ होगा




‎मारवाड़ी_ठाठ‬ वठे.
कैर, कुमटिया, सांगरी, अर गर्मी रो है जोर वठे....

लू री झणकार वठे , धोरों रो है राज वठे ....

माँ बापू रो लाड घणो, है ‪#‎मारवाड़ी_ठाठ‬ वठे...
म्हारो ठीकाणो है वठे, धोराँ री धरती है जठे .
मैं तो चाल्यो मरुदेश, प्यार घणो भाईचारो है जठे .
छाछ-राबड़ी, कांदो-रोटी, ई धरती को खाज। 
झोटा देवै नीम हवा का, तीजण कर री नाज।। 
ई धरती को उजलो गौरव, अर इतिहास कहाणी। 
मरु का गौरव ऊंडा कूआ, बो इमरत सो पाणी।। 
अणथक सेवा अडिग साधना, समता और समाई। 
पर-उपकारी मिनख लियां, कूआं जतरी गहराई।। 
संत अटै का सिरै मौर, या धरती है संतां की। 
नेम-धरम घर लिछमी राखै, कर सेवा कंतां की।। 
सरधा-इमरत हिवड़ै राखै, सांचै मन का लोग। 
सुरग अठे है भोग अठै, है त्याग तपस्या जोग।। 
ऊंडी थाली ठेठ किनारां, खीर परोसी होय। 
भलै मिनख का दरसण, जाणी बेल्यां होया होय।। 
सीरो अमरस बिना दांत को, भोजन है मौमस को। 
स्यालै बणै सूसुआ रोटी, सागै दही सबड़को।।





जीवटता
कोई रंग नहीं होता खुशियों का

कोई ढंग नही होता उनका

कि हम आसानी से उन्हें कर सकें हासिल
जीत जज्बे से मिलती है
जीत,जीत के विश्वास से ही मिलती है
और एक जुटता से होती है फतह !

जीतते वो नहीं

जो ऊंचे पहाड़ों और ऊंची चढ़ाईयों से डरते है

सिर्फ बाते करते हैं
राजनीति और विडंबनाओं की
समंदर के भीतर और बाहर से आती
सुनामी हवाओं की
जिनके कदम बाहर निकलने से डरते है
जीतते वो हैं जो बेपरवाह होते है
आलोचनाओं से
जो जानते हैं हर विजय
सिल देती है आलोचकों का मुंह !!

सलाम जीत के इस जज्बे को

सलाम वर्षों बाद खत्म हुए  वनवास को

सलाम देश के जूनून को
सलाम इस एक जुट आवाज़ और प्रयास को
जिसने जता दिया
कि चमक और आकर्षक सफेदी ही नही जीतती
जीतती है इरादों की दृढ़ता और जीवटता !!!


जीतते हैं परंपरागत गांव और गंवई संस्कृति के ध्वज वाहक भी

क्योंकि उपनिवेशवादी शहर अब शिकार हो गये हैं भटकाव और अपसंस्कृति के
ईमानदारी देर और अंधेर नही देखती
नहीं देखती कि कौन करता है उसकी प्रशस्ति
या उड़ाता है कौन उसका उपहास

इसीलिए कहता हूँ जीतती है जीवटता

जीतता है विश्वास !!!!!




ढूँढ ना पाये...
रोते रोते रात कट गयी भाव ढूँढ ना पाये

मरहम लेकर रहे तडपते घाव ढूँढ ना पाये.....

कभी कभी बेबस होती है

पीडा भी हँसती रोती है

चन्दा को भा गये सितारे
रातें अँधियारे ढोती है
कैसे हमलें करें उजाले दाँव ढूँढ ना पाये.....

बननी ही थी बनी कहानी

रस्म अजब है मगर पुरानी

तुम्हे मिला किस्मत का राजा
उसे मिली सपनों की रानी
हम फिर भटके बीराने में,गाँव ढूँढ ना पाये......

प्यार समर्पण या थी माया

क्या था कोई जान न पाया

बिस्तर पर खुद बिछने वाला
जीवित मन था या थी काया
इन प्रश्नों में उत्तर में अलगाव ढूँढ ना पाये....

मन कहता है उसे छोड दे

खुद जुड जा तू मुझे तोड दे

पगडंडी पर पैर टिकाकर
राजमहल की दिशा मोड दे
पर किस्मत तक जाने वाले पाँव ढूँढ ना पाये.....




ना हिंदू बुरा है ना मुसलमान बुरा है
वो लाश लोगों के कधें पर अंत की तरफ
खिड़की से देखा वो ह्दय विदारक मंजर
कचड़े में पड़ी वो नन्ही सी किलकारी
आँखों में आँसु , दिल में लगा कोई खंजर
उसके मृत्यु क बाद, नन्ही के जन्म के बाद
कौन सा खुदा उनका हुआ ये किसे है ग्यात
निष्ठुर जमानें का भी खुदा ने क्यों दिया साथ

"मंदिर"में दाना चुगकर चिड़ियां "मस्जिद" में पानी पीती हैं

मैंने सुना है "राधा" की चुनरी 
कोई "सलमा"बेगम सीती हैं                         
एक "रफी" था महफिल महफिल "रघुपति राघव" गाता था 
एक "प्रेमचंद" बच्चों को
"ईदगाह" सुनाता था 
कभी "कन्हैया"की महिमा गाता
"रसखान" सुनाई देता है 
औरों को दिखते होंगे "हिन्दू" और "मुसलमान"
मुझे तो हर शख्स के भीतर "इंसान"
दिखाई देता है...
क्योंकि...
ना हिंदू बुरा है ना मुसलमान बुरा है
जिसका किरदार बुरा है वो इन्सान बुरा है....




तालुक़ तोड़ती हूँ तो
तालुक़ तोड़ती हूँ तो 
मुकम्मल तोड देती हूँ 

जिसे मै छोड़ देती हूँ 

मुकम्मल छोड़ देती हूँ 
मोहब्बत हो के नफरत 
निभाती रहती हूँ शिद्दत से जिधर से आए 
ये दरिया उधर ही मोड़ देती हूँ यक़ीन रखती नहीं 
किसी कच्चे तालुक़ पर 
जो धागा टूटने वाला हो 
उसको तोड़ देती हूँ 
मेरे देखे हुए सपने 
कहीं लहरें ना ले जाए घरोंदे 
रेत के तामीर कर के छोड देती हूँ 
अब तक वही बचपन की वही तखरीब -कारी है 
पिंजरे को तोड़ देती हूँ , 
परिंदे छोड देती हूँ ....





सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ वतन, करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,

देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,

हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,

और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.

ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,

सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.

और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,

जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.

ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून

क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में



बटाऊ
बटाऊ, चाल्यां मजलां मिलसी।

मनरा लाडू खार कदे'ई ,सुण्यो न कोई धाप्यो?

उग्यो हथेळी रुंख कणाई,देख्यो नहीँ फलाप्यो!
सूरज बो हि जको रात री
छाती फाङ निकळसी
बटाऊ!, चाल्यां मजलां मिलसी।
गैले रो तो काम अतो ही ,पग ने सीध बतावै,
बो मजळां नै घर बैठां ही
किण नै ल्या'र मिलावै,
इसी हुयां तो पग आळां रा
डाँव पांगळा धरसी,
बटाऊ!, चाल्यां मजलां मिलसी।
तपो तावङा लूआं बाजौ,
चावै चढो थकेलौ,
पण बगतो जा सुण धर कूंचा धर मजळाँ रो हैलो
जद सपनै री कळी थारली
फूल साच रो बणसी!
बटाऊ!, चाल्यां मजलां मिलसी।



सेवानिवृति

सेवानिवृति भी कैसा अवसर है ,

खुशी का कहें या गम का ।

कह नहीं सकते कैसा क्षण है ,
दुखदायी है या है मरहम का ।
      एक क्षण सोचता हूं 
चलो अच्छा है अब आराम करेंगे ।
     पर बेटे सोचते हैं
पिताजी और कुछ काम करेंगे ।
क्योंकि 
ठाले बैठे रहना हराम है ।
रिश्ते नाती हम उम्र के 
अब रोज मिलने आयेंगे।
जी हजूरी रोज रोज की
और फोकट में खायेंगे ।
अब केवल ये बातें करेगे 
इनको क्या काम है ।


सेवानिवृति भी कैसा अवसर है ,

खुशी का कहें या गम का ।

कह नहीं सकते कैसा क्षण है ,
दुखदायी है या है मरहम का ।
      एक क्षण सोचता हूं 
चलो अच्छा है अब आराम करेंगे ।
     पर बेटे सोचते हैं
पिताजी और कुछ काम करेंगे ।
क्योंकि 
ठाले बैठे रहना हराम है ।
रिश्ते नाती हम उम्र के 
अब रोज मिलने आयेंगे।
जी हजूरी रोज रोज की
और फोकट में खायेंगे ।
अब केवल ये बातें करेगे 
इनको क्या काम है ।


सेवानिवृति भी कैसा अवसर है ,

खुशी का कहें या गम का ।

कह नहीं सकते कैसा क्षण है ,
दुखदायी है या है मरहम का ।
      एक क्षण सोचता हूं 
चलो अच्छा है अब आराम करेंगे ।
     पर बेटे सोचते हैं
पिताजी और कुछ काम करेंगे ।
क्योंकि 
ठाले बैठे रहना हराम है ।
रिश्ते नाती हम उम्र के 
अब रोज मिलने आयेंगे।
जी हजूरी रोज रोज की
और फोकट में खायेंगे ।
अब केवल ये बातें करेगे 
इनको क्या काम है ।

सेवानिवृति भी कैसा अवसर है ,

              खुशी का कहें या गम का ।

कह नहीं सकते कैसा क्षण है ,
            दुखदायी है या है मरहम का।
      एक क्षण सोचता हूं 
चलो अच्छा है अब आराम करेंगे ।
     पर बेटे सोचते हैं
पिताजी और कुछ काम करेंगे ।
        क्योंकि 
ठाले बैठे रहना हराम है ।
रिश्ते नाती हम उम्र के 
       अब रोज मिलने आयेंगे।
जी हजूरी रोज रोज की
        और फोकट में खायेंगे ।
अब केवल ये बातें करेगे 
        इनको क्या काम है ।
अरे! सेवानिवृति तो कागजी क्रिया है।
       ये नहीं तो और सही 
कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ है जो 
      पूजनिय होगा हर जगह ।





मित्रता 
दोस्ती है अनमोल रत्न;
नहीं तोल सकता जिसे कोई धन,
सच्ची दोस्ती जिसके पास है;
उसके पास दौलत की भरमार है,
न ही जीत न ही कोई हार है,
दोस्त के दिल में तो बस प्यार ही प्यार है।।
भटके जब भी दोस्त संसार के मोहजाल में,
खींच लाता है सच्चा दोस्त उसे अच्छाई के प्रकाश में,
छोड़ देता है जग सारा जब मुश्किल भरी राह में,
सच्चा दोस्त साथ देता है तब जिंदगी की राह में।।
बने चाहे दुश्मन क्यों न जमाना सारा,
सच्चा दोस्त साथ देता है सदा हमारा,
दोस्त के लिए कुर्बान होता है जीवन सारा,
हर मुश्किल में बनता है वो सहारा।।
सच्ची दोस्ती को वक्त परखतता हर बार है,
वक्त की हर परीक्षा से हसते हुए पास करना ही दोस्ती की पहचान है,
दुनिया की किसी शौहरत की न जिसे दरकार है,
सच्चा दोस्त रखने वाला संसार में सबसे धनवान है।।
रस्सा कसी के इस अभियान में 

सब बराबर योगदान दें ।

एक तरफ तो एक एक को तरसे 
दूसरी तरफ घर पर ही लाखों बरसे 
       



हम लाइन में खड़े है
हम लाइन में खड़े है 

इसका हमें मलाल नहीं हुआ है 

दुख है अभी तक 
कोई मुर्गा हलाल नहीं हुआ है
       बड़ी मछली का भी बलिदान दें ।
जो शौकन थे गर्मजेब के 
उनका बुरा हाल है ।
कुछ हैं बैंक में लखपति 
बाहर कोरे कंगाल है ।





मुस्कान

    इस यज्ञ आहूति को नई पहचान दें।

मासूमियत से भरी होती है मुस्कान,
दिल की खुशी की पहचान होती है मुस्कान,
लगता है जब कोई बेगाना अपना सा,
तो इस छुपे हुए राज को खोलती है मुस्कान।
होठों के घरोंदे में छुपी रहती है मुस्कान,
जीवन को सुलझाती पहेली है मुस्कान,
रुठ जाए जब कोई अपना किसी बात पर,
तो उसको मनाने की जीत में शामिल होती है मुस्कान।
अपनी मंजिल को पाने पर छलकती है मुस्कान,
निराशा भरे जीवन में आशा का संचार है मुस्कान,
जीत की नई परिभाषा है मुस्कान,
बेरंग दुनिया में रंगीन हौसला है मुस्कान।
न जाने कितने रुपों में होती है ये मुस्कान,
पर आखिर में होती है ये दिल की खुशी का ही परिणाम।



 लगता है कि बहुत कुछ गंवा  दिया
माँ बनाती थी रोटी,

पहली गाय की , 

आखरी कुत्ते की
एक बामणी दादी की

एक मेथरानी बाई 

हर सुबह सांड आ जाता था

दरवाज़े पर गुड़ की डली के लिए
कबूतर का चुग्गा

किडियो का आटा ग्यारस, 

अमावस, पूर्णिमा का सीधा

डाकौत का तेल
काली कुतिया के ब्याने पर तेल गुड़ का सीरा

सब कुछ निकल आता था

उस घर से ,

जिसमें विलासिता के नाम पर
एक टेबल पंखा था...

आज सामान से भरे घर में

कुछ भी नहीं निकलता

सिवाय लड़ने की कर्कश आवाजों के.......
मकान चाहे कच्चे थे

लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...

चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे...

सोफे और डबल बेड आ गए

दूरियां हमारी बढा गए....

छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं..

आंगन में वृक्ष थे

सांझे सुख दुख थे...

दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था...

कौवे भी कांवते थे

मेहमान आते जाते थे...

इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था...

रिश्ते निभाते थे

रूठते मनाते थे...

पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था...

मकान चाहे कच्चे थे

रिश्ते सारे सच्चे थे...

अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा  दिया ।





औ मेरे गाँव

औ मेरे गाँव
तुम बहुत याद
आते हो मुझे ...... 

मुझे याद आता है

वो आम का पेड़

जिसके आम खाने की
लालच में
मैं जैसे-तैसे
चढ़ तो जाया
करती थी उस पर
मगर उतर
नहीं पाती थी ......

मुझे याद आता है

रोटी-गुड़-प्याज़

का वो स्वाद
जो मुझे कभी
मिल न सका
शहर के महंगे 
से महंगे खाने में
औ मेरे गाँव
तुम बहुत याद
आते हो मुझे .......

मुझे याद आता है

वो अलाव

जिसके इर्द-गिर्द
सारा कुनबा इकठ्ठा 
हो जाया करता था
और 
सर्दी के साथ-साथ
रिश्तों पर जमी
बर्फ भी पिघल
जाया करती थी
औ मेरे गाँव
तुम बहुत याद
आते हो मुझे ........

मुझे याद आता है

वो साझा-चूल्हा

जिसने रिश्तों
की महीन डोर को
जलाने की बजाय
कुंदन बना दिया
औ मेरे गाँव
तुम बहुत याद
आते हो मुझे .......

मुझे याद आता है

बरगद का वो पेड़

जिसकी छाँव तले
पाते थे सभी सुकून
जिसके इर्द-गिर्द
लगा करती थी
पंचायतें
जिनमें मिला 
करता था
त्वरित न्याय
औ मेरे गाँव
तुम बहुत याद
आते हो मुझे ........

मुझे याद आता है

वो खेत जिसकी 

सौंधी मिटटी
की महक
मुझे आज भी
महसूस होती है
अपने तन-बदन में
खेत तक जाने 
वाली
वो उबड़-खाबड़
पगडंडी जिसने
मुझे कभी
गिरने नहीं दिया
बल्कि हर बार
स्वयं को मेरे
क़दमों के
मुताबिक
संतुलित कर लिया
औ मेरे गाँव 
तुम बहुत याद
आते हो मुझे ......

औ मेरे गाँव

तुम बहुत याद

आते हो मुझे ...... 



लोरी
आ जा री निंदिया आ जा, मुनिया/मुन्ना को सुला जा

मुन्ना है शैतान हमारा

रूठ बितता है दिन सारा
हाट-बाट औ'अली-गली में नींद करे चट फेरी
शाम को आवे लाल सुलावे उड़ जा बड़ी सवेरी!
आ जा निंदिया आ जा तेरी मुनिया जोहे बाट
सोने के हैं पाए जिसके रूपे की है खाट
मखमल का है लाल बिछौना तकिया झालरदार
सवा लाख हैं मोती जिसमें लटकें लाल हज़ार!
आ जा री निंदिया आ जा!
नींद कहे मैं आती हूँ सँग में सपने लाती हूँ
निंदिया आवे निंदिया जाय, निंदिया बैठी घी-गुड़ खाय
भोर पंख ले के उड़ जाय!
वर्षा के मौसम में जुड़ जाता
पानी बरसे झम-झम कर, बिजली चमके चम-चम कर
भोर का जागा मुन्ना, मेरी गोद में सोवे बन-बन कर
निरख-निरख छवि तन-मन वारूँ लोर सुनाऊं चुन-चुन कर
आ जा री निंदिया...




मां बोली सूरज से बेटे
मां बोली सूरज से बेटे, सुबह हुई तुम अब तक सोये,

देख रही हूं कई दिनों से, रहते हो तुम खोये खोये।

जब जाते हो सुबह काम पर, डरे डरे से तुम रहते हो,

क्या है बोलो कष्ट तुम्हें प्रिय,साफ़ साफ़ क्यों न कहते हो।

सूरज बोला सुबह सुबह ही, कोहरा मुझे ढांप लेता है,

निकल सकूं कैसे चंगुल से, कोई नहीं साथ देता है।

मां बोली हे पुत्र तुम्हारा, कोहरा कब है क्या कर पाया,

उसके झूठे चक्रव्यूह को, काट सदा तू बाहर आया।

कवि कोविद बच्चे बूढ़े तक, लेते सदा नाम हैं तेरा,

कहते हैं सूरज आया तो, भाग गया है दूर अंधॆरा।

निश्चित होकर कूद जंग में, विजय सदा तेरी ही होगी,

तेरे आगे अंधकार या, कोहरे की न कभी चलेगी।



उड़न खटोले पर बैठूँ मै
उड़न खटोले पर बैठूँ मैं

पंछी-सा बन जाऊँ,

बिना पंख उड़ जाऊँ नभ में
मन ही मन मुस्काऊँ।

दूर गगन से धरती देखूँ

अचरज में पड़ जाऊँ,

वन, महलों, नदियों को देखूँ
सबको छोटा पाऊँ।

नदियाँ सकरी दिखती मुझको,

महल घरौंदे जैसे,

छोटे गाँव, नगर भी छोटे,
पशु तो चींटी जैसे।

उड़न खटोले से जो दिखता

लगता जादू जैसा,

धरती और गगन को प्रभु ने
रूप दिया है कैसा?




अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,

दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,

हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,

बांह उठीं और मूछें तन गयीं।

इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची।

अब वह जीता, अब यह जीता;

दोनों का बढ चला फ़जीता;

लोग तमाशाई जो ठहरे 
सबके खिले हुए थे चेहरे!

मगर एक कोई था फक्कड़,

मन का राजा कर्रा - कक्कड़;

बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर।

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,

दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,

गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा!

उसने कहा सधी वाणी में,

डूबो चुल्लू भर पानी में;

ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाई चारे को बोओ!

खाली सब मैदान पड़ा है,

आफ़त का शैतान खड़ा है,

ताकत ऐसे ही मत खोओ,
चलो भाई चारे को बोओ।

सुनी मूर्खों ने जब यह वाणी

दोनों जैसे पानी-पानी

लड़ना छोड़ा अलग हट गए
लोग शर्म से गले छट गए।

सबकों नाहक लड़ना अखरा

ताकत भूल गई तब नखरा

गले मिले तब अक्कड़-बक्कड़
खत्म हो गया तब धूल में धक्कड़

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़

दोनों मूरख, दोनों अक्खड़।




मिलते हैं लोग
मिलते हैं लोग लेकिन दिल से नहीं मिलते

जब काम पड़े कोई तो अपने नहीं मिलते

चलते रहें कभी तो मन्ज़िल को पाएंगे 
जो रुक गए उन्हें ही रस्ते नही मिलते
जब भी मिलो किसी से चुगली सुनाई दे 
बस बात यही है के सबसे नहीं मिलते
कैसा है ज़माना यहां पे झुण्ड बुरों की
हम खोज रहे हैं हमे अच्छे नहीं मिलते
बच्चो को प्यार करने मैदान तरसते 
अब खेलते हुए कहीं बच्चे नहीं मिलते
मिलते है हजारों यहाँ अच्छे दिनों में पर 
जब आए दुखघड़ी तो खोजे नहीं मिलते
जो लोग आचरण से नँगे दिखाई दें 
उनके लिए बाजार में पर्दे नहीं मिलते              गिरीश पंकज



मैं नारी हूँ
मैं नारी हूँ, जग की जननी, मुझसे ये दुनिया सुन्दर है 

मुझको जो अपमानित करता वो नर पापी है बदतर है

मुझ पे जो दृष्टि बुरी डाले, सच बोलूँ वो इंसान नहीं 
जो नारी को देवी समझे, उसका जीवन ही बेहतर है
जो 'अरी' नहीं, वह नारी है, नर पे तो अक्सर भारी है 
नारी है बगिया फूलों की, वो इस समाज का जेवर है
फूलों को मत मसलो मूरख, ये तो आँगन की है शोभा
जो समझे ना इसका मतलब वह नर तो केवल वानर है
नारी है केवल देह नहीं, इसके दिल को देखो थोड़ा 
जहाँ देवता बसते हैं वो तो इक पावन मंदर है
नारी है कोमल काया से, पर उसको मत कमजोर कहो 
दुर्गा, काली, या रणचण्डी , ये वक्त पड़ा तो खंजर है




शिकायत   क्यों नही  करते 
मेरे   देश  के  लोगो   शिकायत   क्यों नही  करते ,

जुल्म सहते हो तुम, फिर बगावत क्यों नही करते !

ये लुटेरे , जागीरों  के  मालिक  क्यों लाते  हो तुम ,

खुद  तुम  अपने पर ही  हुकूमत  क्यों नही करते !

ये  अल्फाज भाषण  वादे  अच्छे  नही , गर फिर ,

तुम  इन्हें  बदलने  की  जरूरत  क्यों नही  करते !

यहां   तक   बढ़ेगा  सरफरोशाने  वतन   कातिल ,

निपटने  की  दिल  से  इजाजत  क्यों नही  करते !

खड़ा है  लेने  के  लिए आगोश  ए  ख़ुशी  कुमार ,

कदम बढ़ाकर खुद की  शनाखत क्यों नही करते !

लिए  तरिकियां  घूमते  हो  अब  तुम  दर  - बदर ,

खिलाफ  होकर  खुद को तहारत क्यों नही करते !

है  श्वेत  भेष - धारी  इब्लीस  ये  जनता  जनार्दन ,

हो एक जुट तुम  इनका  हिकमत क्यों नही करते !

ना  हो  जानिब ,  बेखबर  तू  हालात  ए  जुनूं  से ,

आवाज  तुम  खिलाफ ए जुल्मत क्यों नही करते !

हैरान परेशान है तू भी जालिमों के हथकड़ीयों से ,

मिटाकर जुल्मत कुमार खूबसूरत क्यों नही करते !

________________________कुमार अरविन्द




आदमी के भीतर का आदमी हारे ~शीला पांडे 
आदमी के भीतर का आदमी हारे

जी रहा समाज में हर कोई मन मारे

नफरत की आँधी पुरजोर इस कदर

घेर रहीं सूरज के नैनों चढ़कर

ऐसे मौसम में हैं धुंधों के पहरे
धूल झुकी आँखों हैं, कान पड़े बहरे
भूचाली शाखों में नीड़ बेसहारे
समरसता दुबके काँपे डर के मारे।

बीजों से शूल उगें, माटी से सरपत

रत्नजड़ित काया की आभा में बरकत

भीतरी भिखारी ये दाना-दाना तरसे
इच्छाएँ पर्वत-सी स्वार्थ सघन बरसे
खीझ रहा सिर पर ढोता मानव गारे
आधि-व्याधि कीट सर्प कंधों पर धारे।

बहेलिए राजा को मांस नरम-नरम

भाता है खाने में रोज गरम-गरम

ये टुकड़ी शिकारी गठन करके धारे
एक-एक पकड़े वो एक-एक मारे
धकियाते मानव को मानव ही फारे
बिरला ही कोई बच पाता है प्यारे।
आँख-मिचौली खेलें मम्मी
रुको जरा, छिप जाऊँ मम्मी!

बनो चोर तुम, मैं छिप जाऊँ

तुम ढूँढ़ो मैं हाथ ना आऊँ

हार मानकर जब तुम बैठो,
तभी अचानक मैं आ जाऊँ!
गोदी में तेरी आकर मैं,
खिल-खिल हँसूँ-हँसाऊँ मम्मी!

मम्मी फिर मैं चोर बनूँगा,

छिपना आप पलँग के नीचे,

पकडँू जब मैं पीछे-पीछे।
खेल-कूद करके यूँ ही मैं,
तुमको भी बहलाऊँ मम्मी!





रोटी और स्वाधीनता

आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?

मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?

आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।

(2)

हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,

पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?

(3)

झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?

आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।






किसको नमन करूँ मैं भारत?

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?

मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?

किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?
भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?
भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !
खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !
दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !
उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !



चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,

जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,

जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,

राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।

बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,

तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।

वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;

आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।

बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,

अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!

अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,

वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।

अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,

व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।

कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!





घर-आंगन में आग लग रही।

घर-आंगन में आग लग रही।

सुलग रहे वन -उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर- छाजन।
तन जलता है , मन जलता है 
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन।
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगानेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

भाई की गर्दन पर

भाई का तन गया दुधारा

सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बँटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगें,
और दूसरा कहता तिल
भर भूमि न बँटने देंगें।
पंच बना बैठा है घर में,
फूट डालनेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

दोनों के नेतागण बनते

अधिकारों के हामी,

किंतु एक दिन को भी 
हमको अखरी नहीं गुलामी।
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी।
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटानेवाला
मेरा देश जल रहा, 
कोई नहीं बुझानेवाला।

होकर बड़े लड़ेंगें यों

यदि कहीं जान मैं लेती,

कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती।
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता,
मैं न बंधनों में सड़ती
छाती में शूल न गढ़ता।
बैठी यही बिसूर रही माँ,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा, 
कोई नहीं बुझानेवाला।

भगतसिंह, अशफाक,

लालमोहन, गणेश बलिदानी,

सोच रहें होंगें, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की 
देकर खाद खून से सींचा ,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा।
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा, 
कोई नहीं बुझानेवाला।

जब भूखा बंगाल, 

तड़पमर गया ठोककर किस्मत,

बीच हाट में बिकी
तुम्हारी माँ - बहनों की अस्मत।
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी ,
कहाँ कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी।
तब अन्यायी का गढ़ तुमने 
क्यों न चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

पुरखों का अभिमान तुम्हारा

और वीरता देखी,

राम - मुहम्मद की संतानों !
व्यर्थ न मारो शेखी।
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकनेवालों !
भोले बच्चें, अबलाओ के
छुरा भोंकनेवालों !
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा, 
कोई नहीं बुझानेवाला।

घर-घर माँ की कलख

पिता की आह, बहन का क्रंदन,

हाय , दूधमुँहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन ?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी ?
मुँह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी।
हँसते हैं सब देख
गुलामों का यह ढंग निराला।
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

जाति-धर्म गृह-हीन

युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,

आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा।
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे।
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखानेवाला ,
मेरा देश जल रहा, 
कोई नहीं बुझानेवाला।




मैं अछूत हूँ
मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।

किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।

तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥

तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।

और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥

मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?

हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?

मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।

दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥

मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।

यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥

ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।

जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥

वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।

छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥






उठो धरा के अमर सपूतो,


उठो धरा के अमर सपूतो

पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।
नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।




डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।




कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो ।




सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो ।
उठो धरा के अमर सपूतो,



शिक्षक 

सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।

नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।।
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी ।
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ ।।
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के ।
और मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ ।।
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा ।
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ ।।





हम उपवन के फूल मनोहर
हम उपवन के फूल मनोहर

सब के मन को भाते।

सब के जीवन में आशा की
किरणें नई जगाते

हिलमिल-हिलमिल महकाते हैं

मिलकर क्यारी-क्यारी।

सदा दूसरों के सुख दें,
यह चाहत रही हमारी

कांटो से घिरने पर भी,

सीखा हमने मुस्काना।

सारे भेद मिटाकर सीखा
सब पर नेह लुटाना॥

तुम भी जीवन जियो फूल सा,

सब को गले लगाओ।

प्रेम-गंध से इस दुनियाँ का
हर कोना महकाओ॥






बहुत याद आते हैं.

.....मै यादों का 

किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत 
याद आते हैं....

...मै गुजरे पल को सोचूँ 

तो, कुछ दोस्त 

बहुत याद आते हैं....
.....अब जाने कौन सी नगरी में,

आबाद हैं जाकर मुद्दत से....

....मै देर रात तक जागूँ तो ,

कुछ दोस्त 

बहुत याद आते हैं....
....कुछ बातें थीं फूलों जैसी,

....कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,

....मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
....कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

....सबकी जिंदगी बदल गयी,

....एक नए सिरे में ढल गयी,

....किसी को नौकरी से फुरसत नही...

....किसी को दोस्तों की जरुरत नही....

....सारे यार गुम हो गये हैं...

.... "तू" से "तुम" और "आप" हो गये है....

....मै गुजरे पल को सोचूँ 

तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं....

...धीरे धीरे उम्र कट जाती है...

...जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,

...कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है...
और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है ...

.....किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते, 

....फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते...

.....जी लो इन पलों को हस के दोस्त, 

फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ....👍

......हरिवंशराय बच्चन



 माँ 
जो कितना ख़याल करती है

बच्चों के लिए जीती है

उन्हीं के लिए मरती है |
माँ हमारे लिए खाना बनाती

माँ हमें सबकुछ सिखाती

गणित, पहाडा, ए बी सी डी
माँ बच्चों को खूब पढाती |

माँ ही पहली टीचर है

स्कूल बाद में आता है

बच्चा माँ के हाथों ही
काफी कुछ सीख जाता है |

माँ बच्चे का ख़याल रखती

उसका पूरा देखभाल करती

उसी के लिए जीती-मरती
सारे दुःख हंस के सहती |

उसके लिए खाना पकाती

उसे प्यार से खाना खिलाती

उसके बटन टांक देती
उसके कपडे धो डालती |

बच्चा माँ को तंग है करता

रोता है, नींद से जगाता है

इतनी सारी उलझनों पे भी
माँ को बस प्यार आता है |

माँ बच्चे का पहला कंप्यूटर

माँ बच्चे की पहली किताब

हर बच्चे की गूगल, विकिपीडिया
लाये उसके हर सवाल का जवाब |

बचपन के चंचल मन में

जब भी सवाल आता है |

तो हर शिशु के जेहन में
बस माँ का ख़याल आता है |

बच्चा पूछे हजार सवाल

माँ सबका दे जवाब

बच्चे की हर बदमाशी सहती
कहती उसको ‘छोटे नवाब’ !

माँ ही टीचर, माँ ही विद्यालय

माँ ही किताब, माँ ही पुस्तकालय,

माँ ही दोस्त, माँ ही ज्ञान
इतिहास, भूगोल, समाज शास्त्र, विज्ञान |

माँ नखरे उठाये मानो हैं वो ‘बेटे हुजूर’

खिलाये उसे खाना प्यार से घूर-घूर

लोरी सुनाए वो है अंखियों का नूर —
‘चंदामामा दूर, पर पुए पकाए गुड़’ !

‘मदर्स डे’ का इन्तेजार न करो

हर पल माँ का ख़याल करो |

उसका दूसरा बचपन जब आये
तो उसका जीवन खुशाहाल करो |

माँ तो हर दिन ‘बाल दिवस’ मनाती है

पर उसकी याद हमें ‘मदर्स डे’ पे आती है !






बचपन


आह रे... बचपन का वो जमाना बीत गये बचपन के वो पल

टूट गया वो स्वप्न पुराना,
छूट गया रथ सोने जैसा
छूट गया खुशियों का खजाना।

वाह रे बचपन का वो जमाना

आह रे बचपन का वो जमाना !

वो, नीम कौड़ी की खाट बनाना

वो, उनकी छत से पतंग उड़ाना

तीली से वो धनुष बनाना
सींकों के वो बाण सजाना।

मिट्टी के थे खेल- खिलौने

बिकते थे सब औने पौने,

हुर्र-कबड्डी आइस-पाइस
चार आने में सजे नुमाइश।

गिल्ली- डंडा ओला-पाती

कितनी कोमल चिकनी माटी,

कंचे गोली लत्ती-लट्टू 
जीवन का था यही खजाना।

अक्कड़-बक्कड़, चोर सिपाही

चिड़िया उड़ और घघ्घो रानी,

विष-अमृत में मर जी जाना
हांफ-हांफ कर दौड़ लगाना।

पेट लगाकार नल को चलाना

नल के मुंह से मुंह का लगाना,

और घट-घट पानी पीते जाना
जैसे प्यासे को सागर मिल जाना।

सुबह से शादी में सज जाना

शाम से पहले ही थक जाना,

बाराती आने से पहले
दादी पास कहीँ सो जाना।

गौरैया, खांची से फँसाना

भरी धूप डग्गा ढुगराना,

जमीं धूल पर कुछ लिख जाना
चुक्कड़ पर यूं दांत लगाना।

कदम को गिन स्कूल को जाना

छुट्टी पर ही ध्यान लगाना,

कमर पे स्वेटर बांध के आना
चूरन चाट-चाट पछताना।

चियां गिनकर गोट बनाना

कुसली घिसकर शंख बजाना,

नरखे में भूजा गठियाना
भूजकर आलू,राख छुडाना।

पिल्ले का बस कान पकड़ कर

चोर शाह का फर्क बताना,

कानी उंगली से बभनी को
छूकर पूंछ धनी हो जाना।

पूछ न बैठे कठिन पहाड़े

ऐसे नातों से कतराना,

और निकल कर जाते ही बस
बची मिठाई चट कर जाना।

लड़ा के पंजा दम दिखलाना

सांस रोककर खुद अफनाना,

चिक्का,कुश्ती, मार-कलइया
माटी, माथे तिलक लगाना।

बात बात पर अमरख जाना

अंहक अंहक कर दर्द बताना,

मान-मनौव्वल पर इतराना
घर भर से कुट्टी कर जाना।

वाह रे बचपन का वो जमाना

आह रे बचपन का वो जमाना।




अपनी ये सोच परिवर्तित कर ले ।


ऐ ! प्रकृति थोड़ी सी रिश्वत ले

 घमंडी धनवान उवाच
ऐ ! सूरज थोड़ी सी रिश्वत ले ,

अपनी ये तपिश कम कर ले ।

तेरा ताप तो बढ़ा ही जा रहा ,

धरती पर इंसान जला जा रहा ।

एसी , कूलर और ठण्डा पानी ,

इतनी गर्मी में सब हुए बेमानी ।

तू हमें इतना क्यों सता रहा  ,

क्या कुछ माल-पानी चाह रहा ।

अरे ! हम बहुत बड़े अमीर हैं ,

कईयों के खरीदे जमीर हैं ।

हमारा समय खराब न कराओ ,

जल्दी से अपनी कीमत बताओ ।

हम देंगे पैसा आप ऐश कीजिए ,

ब्रांडेड खाइए और मॉल में घूमिए ।

चाहें तो प्लेन का टिकट लीजिए ,

पर तपिश की मात्रा कम कीजिए ।

ऐ ! चाँद थोड़ी सी रिश्वत ले ,

अपनी शीतलता दुगुनी कर ले ।

हमने सूरज को भी समझाया था ,

पर उसने ऑफर ठुकराया था ।

सूरज तो बेरहम हुआ जा रहा ,

तेरा ही सहारा नजर आ रहा ।

तुझे दे सकते हैं रुतबा आलीशान ,

बस हमारी बात को ले तू मान ।

अपनी शीतलता को दुगुना करना ,

छः महीने बिल्कुल भी न घटना ।

रात में बिल्कुल भी न पड़ना मन्द ,

छः माह को अमावस करना बन्द ।

हो सके तो दिन में भी निकलना ,

दोपहरी की गर्मी को कम करना ।

बदले में देंगे पैेकेज शानदार ,

बंगला , केबिन और मोटर कार ।

ऐ ! मेघ थोड़ी सी रिश्वत ले ,

मेरे अनुसार तू वृष्टि कर ले ।

आजकल तो मनमौजी हुआ जा रहा ,

जब भी चाहता तब बरसा जा रहा ।

तू जब मन चाहता हमें भिगोता है ,

क्या तेरा कोई नियम नहीं होता है ।

तू अपनी पॉलिसी कुछ चेंज कर ,

मेरे अनुसार बारिश अरेंज कर ।

एक तो ऑफिस आते - जाते न बरसना ,

मेरे सोते समय बिल्कुल भी न गरजना ।

बरसने का टाइम कर ले सेट ,

बदले में दूँगा तेरे मनचाहे रेट ।

मेरे बात मान ले बिना कोई पेंच ,

एक बार तो अपना ईमान ले बेच ।

ईमान बेचने में तेरा ही फायदा है ,

अरे 21वीं सदी का यही कायदा है ।

ऐ ! प्रकृति थोड़ी सी रिश्वत ले ,

अपना ये प्रकोप कम कर ले ।

मेघ , चन्द्रमा और सूरज , 

न सुनी इन्होंने मेरी अरज ।

तेरे बच्चों में अपार घमण्ड ,

क्यों हैं तेरे बालक उद्दण्ड ।

मैंने इतने अच्छे ऑफर दिए ,

पर तेरे बच्चे ध्यान न दिए ।

अब तुझे भी दे रहा हूँ चेतावनी ,

कहो इनसे मेरी बात है माननी ।

वर्ना तेरे सारे घोटाले खुलवाऊँगा ,

तेरे कृत्यों पर तुझे जेल करवाऊँगा ।

कभी लाती बाढ़ तो कभी भूस्खलन ,

कभी लाकर भूकम्प लाखों का दमन ।

जो तूने मेरा ऑफर न किया स्वीकार ,

भगवान के आगे पेश करूँगा ये भ्रष्टाचार ।

प्रकृति उवाच
ऐ ! मानव थोड़ी सी शर्म कर ले ,

अपनी ये सोच परिवर्तित कर ले ।

तुझे है बस धन का सम्मोहन ,

तूने किया मेरा अंधाधुंध दोहन ।

पर धन से हर वस्तु नहीं खरीदी जाती ,

प्रकृति को लगी चोट यूँ ही न भर पाती ।

बनाई ऊँची इमारत खोदी गहरी खदान ,

मेरे कण - कण बेचकर बन बैठा तू महान ।

मेरी कीमत तूने लगाई है तो तू ही चुकाएगा ,

लिया है मुझसे लाभ तो हानि कौन उठाएगा ।

मेरे सूर्य , चन्द्रमा , मेघ व्यवहार में न रूखे हैं ,

न बेईमान हैं न तेरी तरह पैसे के वो भूखे हैं ।

हम आदिकाल से अब तक बिल्कुल वैसे हैं ,

हाँ पहले तेरे पास हृदय था आज जेब में पैसे हैं ।

पर पैसे से बिकने को हर चीज बाजार में न आती ,

माँ के अंग बेच - बेच नई माँ नहीं खरीदी जाती ।

ऐ ! मानव थोड़ी सी शर्म कर ले ,

अपनी ये सोच परिवर्तित कर ले ।

ऐ ! मानव थोड़ी सी शर्म कर ले ,

अपनी ये सोच परिवर्तित कर ले ।



पत्नी को परमेश्वर मानो
तुम्हारा भाग्यशाली पिता

यदि ईश्वर में विश्वास न हो, 

उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको ! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो ! 
पत्नी को परमेश्वर मानो !

वे अन्नपूर्णा जग-जननी, 

माया हैं, उनको अपनाओ। 

वे शिवा, भवानी, चंडी हैं, 
तुम भक्ति करो, कुछ भय खाओ। 
सीखो पत्नी-पूजन पद्धति, 
पत्नी-अर्चन, पत्नीचर्या 
पत्नी-व्रत पालन करो और 
पत्नीवत्‌ शास्त्र पढ़े जाओ। 
अब कृष्णचंद्र के दिन बीते, 
राधा के दिन बढ़ती के हैं। 
यह सदी बीसवीं है, भाई ! 
नारी के ग्रह चढ़ती के हैं। 
तुम उनका छाता, कोट, बैग, 
ले पीछे-पीछे चला करो, 
संध्या को उनकी शय्‌या पर 
नियमित मच्छरदानी तानो !! 
पत्नी को परमेश्वर मानो !

तुम उनसे पहले उठा करो, 

उठते ही चाय तयार करो। 

उनके कमरे के कभी अचानक, 
खोला नहीं किवाड़ करो। 
उनकी पसंद के कार्य करो, 
उनकी रुचियों को पहचानो, 
तुम उनके प्यारे कुत्ते को, 
बस चूमो-चाटो, प्यार करो। 
तुम उनको नाविल पढ़ने दो,
आओ कुछ घर का काम करो। 
वे अगर इधर आ जाएं कहीं , 
तो कहो-प्रिये, आराम करो ! 
उनकी भौंहें सिगनल समझो, 
वे चढ़ीं कहीं तो खैर नहीं, 
तुम उन्हें नहीं डिस्टर्ब करो, 
ए हटो, बजाने दो प्यानो ! 
पत्नी को परमेश्वर मानो !

तुम दफ्तर से आ गए, बैठिए ! 

उनको क्लब में जाने दो। 

वे अगर देर से आती हैं,
तो मत शंका को आने दो। 
तुम समझो वह हैं फूल, 
कहीं मुरझा न जाएं घर में रहकर !
तुम उन्हें हवा खा आने दो, 
तुम उन्हें रोशनी पाने दो, 
तुम समझो 'ऐटीकेट' सदा, 
उनके मित्रों से प्रेम करो। 
वे कहाँ, किसलिए जाती हैं-
कुछ मत पूछो, ऐ 'शेम' करो !
यदि जग में सुख से जीना है, 
कुछ रस की बूँदें पीना है, 
तो ऐ विवाहितो, आँख मूँद, 
मेरे कहने को सच मानो ! 
पत्नी को परमेश्वर मानो ।

मित्रों से जब वह बात करें,

बेहतर है तब मत सुना करो। 

तुम दूर अकेले खड़े-खड़े,
बिजली के खंबे गिना करो।

तुम उनकी किसी सहेली को 

मत देखो, कभी न बात करो। 

उनके पीछे उनके दराज से 
कभी नहीं उत्पात करो। 
तुम समझ उन्हें स्टीम गैस, 
अपने डिब्बे को जोड़ चलो। 
जो छोटे स्टेशन आएं तुम,
उन सबको पीछे छोड़ चलो। 
जो सँभल कदम तुम चले-चले, 
तो हिन्दू-सदगति पाओगे, 
मरते ही हूरें घेरेंगी, 
तुम चूको नहीं, मुसलमानो !
पत्नी को परमेश्वर मानो !

तुम उनके फौजी शासन में, 

चुपके राशन ले लिया करो। 

उनके चेकों पर सही-सही 
अपने हस्ताक्षर किया करो। 
तुम समझो उन्हें 'डिफेंस एक्ट', 
कब पता नहीं क्या कर बैठें ? 
वे भारत की सरकार, नहीं 
उनसे सत्याग्रह किया करो। 
छह बजने के पहले से ही, 
उनका करफ्यू लग जाता है।
बस हुई जरा-सी चूक कि 
झट ही 'आर्डिनेंस' बन जाता है। 
वे 'अल्टीमेटम' दिए बिना ही 
युद्ध शुरू कर देती हैं, 
उनको अपनी हिटलर समझो, 
चर्चिल-सा डिक्टेटर जानो ! 
पत्नी को परमेश्वर मानो ।





बडेरा
_________________

बाग बिगाङे बांदरो,

सभा बिगाङे फूहङ ।
लालच बिगाङे दोस्ती
करे केशर री धूङ ।।
जीभड़ल्यां इमरत बसै,
जीभड़ल्यां विष होय।
बोलण सूं ई ठा पड़ै,
कागा कोयल दोय।।
चंदण की चिमठी भली,
गाडो भलो न काठ।
चातर तो एक ई भलो,
मूरख भला न साठ।।
गरज गैली बावली,
जिण घर मांदा पूत ।
सावन घाले नी छाछङी,
जेठां घाले दूध ।।
पाडा बकरा बांदरा,
चौथी चंचल नार ।
इतरा तो भूखा भला,
धाया करे बोबाङ ।।
भला मिनख ने भलो सूझे
कबूतर ने सूझे कुओ ।
अमलदार ने एक ही सूझे
किण गाँव मे कुण मुओ ।।




नई रोशनी


देखा पूरब में आज सुबह,

एक नई रोशनी फूटी थी।
एक नई किरन, ले नया संदेशा,
अग्निबान-सी छूटी थी॥

एक नई हवा ले नया राग,

कुछ गुन-गुन करती आती थी।

आज़ाद परिन्दों की टोली,
एक नई दिशा में जाती थी॥

एक नई कली चटकी इस दिन,

रौनक उपवन में आई थी।

एक नया जोश, एक नई ताज़गी, 
हर चेहरे पर छाई थी॥

नेताजी का था जन्मदिवस,

उल्लास न आज समाता था।

सिंगापुर का कोना-कोना, 
मस्ती में भीगा जाता था।

हर गली, हाट, चौराहे पर,

जनता ने द्वार सजाए थे।

हर घर में मंगलाचार खुशी के, 
बांटे गए बधाए थे॥

पंजाबी वीर रमणियों ने,

बदले सलवार पुराने थे। 

थे नए दुपट्टे, नई खुशी में,
गये नये तराने थे॥

वे गोल बांधकर बैठ गईं, 

ढोलक-मंजीर बजाती थीं।

हीर-रांझा को छोड़ आज,
वे गीत पठानी गाती थीं।

गुजराती बहनें खड़ी हुईं,

गरबा की नई तैयारी में।

मानो वसन्त ही आया हो,
सिंगापुर की फुलवारी में॥

महाराष्ट्र-नन्दिनी बहनों ने, 

इकतारा आज बजाया था। 

स्वामी समर्थ के शब्दों को, 
गीतों में गति से गाया था॥

वे बंगवासिनी, वीर-बहूटी,

फूली नहीं समाती थीं। 

अंचल गर्दन में डाल, 
इष्ट के सम्मुख शीश झुकाती थीं-



भारत में फैले प्रजातंत्र
''प्यारा सुभाष चिरंजीवी हो, 

हो जन्मभूमि, जननी स्वतंत्र ! 

मां कात्यायिनि ऐसा वर दो, 
भारत में फैले प्रजातंत्र !!''

हर कण्ठ-कण्ठ से शब्द यही,

सर्वत्र सुनाई देते थे। 

सिंगापुर के नर-नारि आज, 
उल्लसित दिखाई देते थे॥
धान पराया हुआ, हल्दी परायी,
चढ़ गयी नीलामी पर अमराई
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

अपने रहे न घने नीम के साए

गमलों में कांटे ही कांटे उगाये,

पछुवा के रंग में रंगी पुरवाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

पानी तो बिक गया बीच बाजारी,

धूप-हवा की कल आएगी बारी,

सौदागरों ने है मंडी लगाईं.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

रोज दिखाके नए सपने सलोने,

हाथों में दे दिए मुर्दा खिलोने,

राम दुहाई मेरे राम दुहाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.





उठ जा अब तो जाग

कौन बुझाए खुद के भीतर, रहो जलाते आग,

ऐसे नहीं मिटा पाएगा, कोई आपका दाग।
मन की बातें कभी न करते, भीतर रखते नाग,
कैसे बतियाएं हम तुमसे, करते भागमभाग।
कहे चोर को चोरी कर ले, मालिक को कह जाग,
इज्जत सबकी एक सी होती, रहने दो सिर पाग।
धूम मचाले रंग लगा ले, आया है अब फाग,
बेसुरी बातों को छोड़ दे, गा ले मीठा राग।
मन के अँधियारे को मेट दे, क्यों बन बैठा काग,
कब तक सोये रहोगे साथी, उठ जा अब तो जाग।







द्वार खुला है, अंदर आओ       Mahadevi verma         

आ गए तुम?

द्वार खुला है, अंदर आओ..!

पर तनिक ठहरो..

ड्योढी पर पड़े पायदान पर,

अपना अहं झाड़ आना..!
मधुमालती लिपटी है मुंडेर से,

अपनी नाराज़गी वहीँ उड़ेल आना..!

तुलसी के क्यारे में,

मन की चटकन चढ़ा आना..!

अपनी व्यस्ततायें, बाहर खूंटी पर ही टांग आना..!
जूतों संग, हर नकारात्मकता उतार आना..!
बाहर किलोलते बच्चों से,

थोड़ी शरारत माँग लाना..!

वो गुलाब के गमले में, मुस्कान लगी है.. 

तोड़ कर पहन आना..!

लाओ, अपनी उलझनें मुझे थमा दो..

तुम्हारी थकान पर, मनुहारों का पँखा झुला दूँ..!

देखो, शाम बिछाई है मैंने,

सूरज क्षितिज पर बाँधा है,

लाली छिड़की है नभ पर..!
प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर, चाय चढ़ाई है,

घूँट घूँट पीना..!

सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना..!!




लम्बी होती हुई परछाइयाँ ,
लम्बी होती हुई परछाइयाँ ,

खामोश सिसकता एक शहर देखा ...

जीवनपथ की पगडण्डियों में ,
इंसानी फितरत का कुछ ऐसा असर देखा ...
हृदय में कुछ प्रश्न कुछ व्यग्रता ,
दुनियाबी चेहरा फिर भी प्रखर देखा ...
मौजें थी दुनिया की हसरतें भी थीं ,
लेकिन खुद को खुद से ही बेखबर देखा ...
गैर हाँथो में मलहम था दुआओं का,
सिहर उठा जब अपनों के पास खंजर देखा ...
भूलकर भी जो भूला नहीं जाता ,
मेरी आँखों ने कुछ ऐसा ही मंजर देखा ...
लहजे शिकायती होे गये लब्ज़ खामोश,
जब दुनिया को खुद की जरूरत से इतर देखा...
सवाल जवाब की महफ़िलों में शामिल ,
अक्सर खुद को ही सुबह शाम दोपहर देखा




 आज सडकों पर / दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,

पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,

आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,

यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,

रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 

राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

~





   "मुस्कराने के लिए"
मसखरा मशहूर है, आँसू बहानेके लिए

बाँटता है वो हँसी, सारे ज़माने के लिए

घाव सबको मत दिखाओ, लोग छिड़केंगे नमक

आएगा कोई नहीं मरहम लगाने के लिए

देखकर तेरी तरक्की, ख़ुश नहीं होगा कोई

लोग मौक़ा ढूँढते हैं, काट खाने के लिए

फलसफ़ा कोई नहीं है, और न मकसद कोई

लोग कुछ आते जहाँ में, हिनहिनाने के लिए

मिल रहा था भीख में, सिक्का मुझे सम्मान का

मैं नहीं तैयार झुककर उठाने के लिए

ज़िंदगी में ग़म बहुत हैं, हर कदम पर हादसे रोज

कुछ समय तो निकालो, मुस्कुराने के लिए

सूरज के साथ-साथ
सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे,
घंटी बजती थी अनाथ आश्रम में
भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की,
दूर-दूर तक फैले खेतों पर,
धुएँ में लिपटे गाँव पर,
वर्षा से भीगी कच्ची डगर पर,
जाने कैसा रहस्य भरा करुण अन्धकार फैल जाता था,
और ऐसे में आवाज़ आती थी पिता
तुम्हारे पुकारने की,
मेरा नाम उस अंधियारे में
बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में।
मैं अब भी हूँ
अब भी है यह रोता हुआ अन्धकार चारों ओर
लेकिन कहाँ है तुम्हारी आवाज़
जो मेरा नाम भरकर
इसे अविकल स्वरों में बजा दे।











वे नहीं आए

तुम्हारी अन्तिम यात्रा में

वे नहीं आए

जो तुम्हारी सेवाओं की सीढ़ियाँ लगाकर
शहर की ऊँची इमारतों में बैठ ग थे,
जिन्होंने तुम्हारी सादगी के सिक्कों से
भरे बाजार भड़कीली दुकानें खोल रक्खी थीं;
जो तुम्हारे सदाचार को
अपने फर्म का इश्तहार बनाकर
डुगडुगी के साथ शहर में बाँट रहे थे।

पिता! तुम्हारी अन्तिम यात्रा में वे नहीं आए

वे नहीं आए



बहिन आज फूली समाती न मन में

बहिन आज फूली समाती न मन में ।

तड़ित आज फूली समाती न घन में ।।
घटा है न झूली समाती गगन में ।
लता आज फूली समाती न बन में ।।
कही राखियाँ है, चमक है कहीं पर,
कही बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं ।
ये आयी है राखी, सुहाई है पूनो,
बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं ।।
मैं हूँ बहिन किन्तु भाई नहीं है ।
है राखी सजी पर कलाई नहीं है ।।
है भादो घटा किन्तु छाई नहीं है ।
नहीं है खुशी पर रुलाई नहीं है ।।
मेरा बंधु माँ की पुकारो को सुनकर-
के तैयार हो जेलखाने गया है ।
छिनी है जो स्वाधीनता माँ की उसको
वह जालिम के घर में से लाने गया है ।।
मुझे गर्व है किन्तु राखी है सूनी ।
वह होता, खुशी तो क्या होती न दूनी ?
हम मंगल मनावे, वह तपता है धूनी ।
है घायल हृदय, दर्द उठता है खूनी ।।
है आती मुझे याद चित्तौर गढ की,
धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला ।
है माता-बहिन रो के उसको बुझाती,
कहो भाई, तुमको भी है कुछ कसाला ? ।।
है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है ।
रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है । ।
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है । 
इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है ।।
आते हो भाई ? पुन पूछती हूँ--
कि माता के बन्धन की है लाज तुमको?
-तो बन्दी बनो, देखो बन्धन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको । 




आप धीरे धीरे मरने लगते हैं...
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं ,

अगर आप करते नहीं कोई यात्रा ,

अगर आप पढ़ते नहीं कोई किताब ,
अगर आप सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ ,
अगर आप करते नहीं किसी की तारीफ़,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .

जब आप मार डालते हैं अपना स्वाभिमान ,

जब आप नहीं करने देते मदद अपनी,
न करते हैं मदद दूसरों की,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .

अगर आप बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के, 

चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
अगर आप नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार ,
अगर आप नहीं पहनते हैं अलग अलग रंग, 
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .

अगर आप नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,

और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को ,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें ,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को ,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .

अगर आप नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को 

जब हों आप असंतुष्ट अपने काम  और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को ,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का ,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को 
अपने जीवन में कम से कम एक बार 
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की ...

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं...



तब विद्रोह जरुरी है

जब सूरज संग हो जाए अंधियार के, तब दीये का टिमटिमाना जरूरी है…
जब प्यार की बोली लगने लगे बाजार में, तब प्रेमी का प्रेम को बचाना जरूरी है……
जब देश को खतरा हो गद्दारों से, तो गद्दारों को धरती से मिटाना जरूरी है….
जब गुमराह हो रहा हो युवा देश का, तो उसे सही राह दिखाना जरूरी है………..
जब हर ओर फैल गई हो निराशा देश में, तो क्रांति का बिगुल बजाना जरूरी है…..
जब नारी खुद को असहाय पाए, तो उसे लक्ष्मीबाई बनाना जरूरी है…………
जब नेताओं के हाथ में सुरक्षित न रहे देश, तो फिर सुभाष का आना जरूरी है……
जब सीधे तरीकों से देश न बदले, तब विद्रोह जरूरी है…



कितना प्यारा देश हमारा,

गर्मी का मौसम जब आए,

सूरज रंग-गुलाल लुटाए।
वर्षा में बादल पिचकारी-
बनकर हमें भिगोता जाए।
जाड़ों में कुहरे के उजले-
कपड़े लाता अपना देश।
हर मौसम में होली का 
त्योहार मनाता अपना देश।

गंगा की लहरों-सा चंचल,

दृढ़ विन्ध्याचल-सा ठहरा।

तन हिमगिरि से भी ऊँचा है,
मन सागर से भी गहरा।
केसर की क्यारी-सा हर पल-
गन्ध लुटाता अपना देश।

कहीं डांडिया, गरबा, गिद्दा,

कत्थक और भरत-नाट्यम।

बिरहा कहीं, कहीं पर चैता,
कहीं मृदंग, ढोल ढम-ढम।

फागुन आते ही मस्ती में-

तान लगाता अपना देश।

खेत और खलिहानों में,

हर पल इठलाता अपना देश।

कितना प्यारा देश हमारा,
हँसता-गाता अपना देश।